वक़्त , बदलाव और हम

समय के साथ बदलाव जरूरी है, यही प्रकृति का नियम है। जो इस नियम की पालना नहीं करता वो वक़्त में कहीं पीछे छूट जाता है और समय का चक्र उसको पटक कर जबरदस्ती भविष्य में ले चलता है । हालाँकि ये जानना कि बदलाव कितना आना चाहिए ये कठिन विषय है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में रहने के लिए सामजिक होना अत्याधिक  आवश्यक है पर क्या बाहरी आडंबर और मुस्कुराते चेहरे से सामाजिकता आती है ? क्या गले मिलकर दिलों में द्वेष रखने से सामाजिकता आ सकती है ? ये कहना कठिन है। कल  एक पुराने दोस्त से बात करते हुए ख़याल आया कि शायद हम वो अंतिम पीढी हो सकते हैं जो बिना किसी मतलब के किसी को यूँ ही याद करते हैं और एक दूसरे पर बेवजह नाराज भी होते हैं और फिर कुछ वक़्त बाद बातें भी करने लगते हैं,  आज किसी के पास किसी को मनाने का तो क्या पर रूठने का समय भी नहीं है, किसी की मदद करने  अगर कोई आ जाये तो ये हाथ पकड़ने से पहले ये अनुमान लगाया जाता है कि इसके बदले क्या देना पड़ेगा, हम अपने आप को इतना काबिल और आत्मनिर्भर मान लेते हैं कि सोचते हैं कि हमे किसी की जरूरत नहीं पड़ेगी। आज भावनात्मक सम्बन्ध जैसे लुप्त होने की कगार पर पहुंच  हैं, किसी को जब जब तक आपकी आवश्यकता मह्सूस नहीं होती वो  आपसे क्यों बात करे और आपके बारे में क्यों सोचे ? हम किसी को तब याद करते हैं जब हमारे पास कुछ ऐसा वक़्त होता है जिसमे हमारे पास कुछ करने को नहीं होता और अक्सर अब हम सो भी नहीं सकते। पर कुछ चंद मिनट अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी से निकालकर किसी का हाल चाल पूछ कर अगर एक खुशहाल मौसम बनाया जा सके तो वो शायद इतना भी महंगा नहीं, मेरे अनुसार तो नहीं। संसार से विलुप्त होती भावनात्मकता चिंता का विषय है। .हम मनुष्य हैं क्योंकि हम दूसरों की  भावनाएं  प्रेम, दुःख, दर्द समझ सकते हैं। आज हम एक अच्छा काम करने के बाद नजर उठा कर चलते हैं और सोचते हैं कि कितना बड़ा काम कर दिया और गलत काम तो इतना आम हो गया है कि उसका होना आवश्यकता बन चुका है। कितना दुखद है जब हम ऐसे विचार सोशल मीडिया पर पढ़ते हैं कि "अपने लिए स्वार्थी बनें वरना ये  दुनिया आपको जीने नहीं देगी" ये तर्कसंगत लगता है, क्योंकि न जाने कितने लोग ठोकर खाकर एक नयें रास्ते पर चल पड़े हैं। लोग कहते हैं किसी पर अपेक्षा रखने से दिल दुखी रहता है तो अपेक्षा रखना ही छोड़ दो, ये कैसे सम्भव है दिल को समझना कि किस से अपेक्षा करनी है किस से नहीं पर आधे से ज्यादा लोगों ने इस पर महारथ हांसिल कर दी है और वो कहते हैं भाड़ में जाने दो।

भावनाएं ही हैं जिनसे हमारे जिन्दा होने का अर्थ है,  यही स्थिति रही तो एक दिन रोबोट्स और हम में फर्क नहीं रह जायेगा, क्योंकि जरूरतें तो उनसे ही पूरी हों जाएँगी फिर हमारे रहने का अर्थ ही क्या रह जायेगा ।

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