लोगों का मानना है कि आपको प्यार नहीं हुआ तो आप उसको समझ नहीं सकते और समझ नहीं सकते तो लिख नहीं पाओगे, शायद ये सच भी है पर एक लेखक का काम है कि वो आपको बैठे बैठे पूरे ब्रह्माण्ड की सैर करा दे तो कभी कभी चाँद तारों को तोड़ने की बात करें ,ऐसे ही कुछ साल पहले मैंने लिखा था। ...
किसी ने उसे खूबसूरत कहा ,
तो किसी ने आंखों की तारीफ की
कोई उसकी मुस्कुराहट पर मर मिटा
तो कोई हुस्न का दीवाना हुआ,
हम पर जब बात आई तो
बेवाक देखते रहे,
सोचते रहें ,क्या बोलें
कैसे कहूँ कि तुम्हारी शरारतों पर फिदा हूँ
उन आंखों की चमक में न जाने क्या है
देखूं तो धड़कने बढ़ जाती हैं
फिर सोचा कि ये बोलूं या वो बोलूं
यही कश्मकश में खामोशी छायी रही
हस कर महफ़िल से फिर हम लौट आये
घर आ कर उठाई फिर कलम,
और दर्ज कर दी इतिहास के पन्नों में ये खामोशी ।
आज कल लोगों को प्यार न जाने इतनी जल्दी कैसे हो जाता है, और जितना जल्दी होता है उतना जल्दी हवा में उड़ जाता है, वो छुप के देखना , आँखों से बात करना सब फ़िल्मी सा हो गया है, हालाँकि फिल्म वाले भी अब ऐसी फिल्मे नहीं बनाते ये सब पुराने ज़माने की बात हो गयी है, पर देखो न कितनी कशिश थी उस एक खत को लिखने में जिसे चुपचाप किताब के बीच में रखकर कही रातों की उड़ जाती थी और कभी -कभी उस खत का पता भी नहीं चलता था कि वो उस तक पहुंचा या नहीं, उसकी आँखों पर न जाने कितने ग़ालिब से बेहतर शेर लिखे गए और वो उन्हीं के साथ फना हो गए, ज्यादा ही फ़िल्मी लगता है पर सोच के देखो तो ये जल्दबाजी में हुए प्यार से काफी बेहतर था, आज लोगों के पास विकल्प बहुत हैं, एक से बढ़कर एक चेहरे दिखाई देते हैं और लोग मर मिट जाते हैं उस खूबसूरती पर. हालाँकि अगर आपको प्यार है तो आपको सब फीका सा लगता है जैसे चाय में चीनी नहीं है, चाय के दीवानो को जितनी भी कॉफ़ी पीला दो वो मुस्कराहट केवल चाय की चुस्की के साथ ही आती है , जैसे ही ये बातें मैंने की वैसे ही मुझसे पूछा कि कोण थी वो ? प्यार नहीं हुआ तो ये सब कैसे पता ? और नहीं हुआ तो करने में हर्ज ही क्या हैकिस बात का डर है तुम्हें ? ..
डर है इश्क़ मुक्कमल न होने का।
डर है किसी के बीच राह में छोड़ जाने का
डर है किसी रूठे को न मना पाने का
डर है उसके दुनिया से घुल मिल जाने का
डर है उसका वक्त के साथ बदल जाने का
डर है शीशे के टूट कर बिखर जाने का
डर है बिखरे टूकड़ों को समेटने में वक्त निकल जाने का
पर किसने देखा इश्क़ को मुकम्मल होते हुए,
मैंने तो नहीं
शायद किसी शायर ने भी नहीं
क्या पता हुए भी हों पर गिने चुने।
अब आप सोच रहे होंगे कि एक तो निराशावादी ऊपर से रूढ़िवादी
हाँ अब तक दिल को समझा नहीं पाए हैं कि इसका काम तो रक्तसंचार है
न वक्त के साथ बदलना मंजूर है
जिस्म से इतनी दिलचस्पी नहीं
रूह से कुछ लगाव हो तो बात है।
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